तेलंगाना के यदाद्रि भुवनगिरि जिले का छोटा-सा गांव रघुनाथपुरम आज वैश्विक मंच पर अपनी बुनकर कौशल के लिए जाना जाता है. यहां के करघों पर बुनी जाने वाली ‘कडालुंगी’ ने इस गांव को महाद्वीपों तक प्रसिद्ध कर दिया है. दुबई से लेकर अफ्रीकी देश युगांडा तक इसकी मांग है. तेलंगाना के लिए यह बात गर्व की बात है हथकरघा कला ने इस गांव को रोजगार, पहचान और सम्मान- तीनों दिलाए हैं.
रघुनाथपुरम गांव सदियों पुरानी बुनकर परंपरा को जीवित रखा है. यहां करीब 1100 परिवार रहते हैं, जिनमें से अधिकांश पद्मशाली समुदाय से हैं. गांव में 800 से ज़्यादा करघे और 400 हथकरघे लगातार चलते रहते हैं. जिन पर दिन-रात कडालुंगी जैसी प्रसिद्ध लुंगियां तैयार की जाती हैं.
‘कडालुंगी’ की खासियत इसके सिरों पर बने सजावटी लटकनों में है. जो इसे अन्य लुंगियों से अलग पहचान देते हैं. इसकी बुनाई कोई साधारण काम नहीं है. इसकी प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है. कुशल बुनकर, रंगरेज और कारीगर मिलकर हर दिन करीब 2,000 कडालुंगी तैयार करते हैं. सप्ताह में एक बार थोक में मुंबई भेजा जाता है, जहां से इन्हें युगांडा और दुबई भेजा जाता है.
बुनकर मास्टर कटकम वेंकटेशम बताते हैं कि रघुनाथपुरम की लुंगियों की युगांडा की महिलाओं में खास मांग है. वहां के व्यापारी इन्हें स्थानीय परिधानों के रूप में इस्तेमाल करते हैं. पहले ये उत्पाद केवल हैदराबाद के बाजारों तक सीमित थे, लेकिन अब इनकी पहुंच अंतरराष्ट्रीय बन चुकी है.
तीन दशकों से जारी यह कारोबार अब करोड़ों रुपये का हो चुका है. गांव के सैकड़ों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. रघुनाथपुरम आज यह साबित करता है कि जब हुनर और परंपरा साथ चलें, तो एक साधारण गांव भी विश्व मानचित्र पर अपनी पहचान छोड़ सकता है.
